गिलगमेश या बिलगमेश की वीरगाथा एक मेसोपोटामिया या प्राचीन इराक की वीरगाथा है ।
इस महागाथा को पत्थर की ईट पर लिखा गया था और वे 12 थी पर 12वि सही हालत में न होने के कारन कहानी का अंत कोई नहीं जानता।पर हाल ही में 12वि ईट मिली है और आज में आपको पूरी कहानी बताऊंगा।
ये कहानी है सुमेर शहर के राजा गिलगमेश (3000 ईसापूर्व )की साहसी कारनामो पर है।2500 ईसापूर्व में सर्गोन के पुरे मेसोपोटामिया को जीतने के बाद ये वीरगाथा काफी महसूर हुई ।
सिकंदर के फारस आक्रमण से पहले ये महागाथा वहा बहोत लोकप्रिय थी ।

कहानी

गिलगमेश सुमेर का 5वा एवं शक्तिशाली राजा था,वह आधा मानव और आधा देवता था।वह काफी सुन्दर और हस्त पुस्त था ।कई शहरों को जीतने के बाद उसने उरुक को अपनी राजधानी बनायीं
।अपनी सफलता के कारन और उसके जीतना इस पृथ्वी पर कोई शक्तिशाली न पाकर उसे घमंड हो गया और एक क्रूर राजा बन गया।
वह मजदूरो से अधिक काम कराता और किसी भी सुन्दर कन्या चाहे वो उसके किसी सेनापति की क्यों न हो उसकी इज्ज़त लूट लेता। आखिर लोगो के देवताओ से प्राथना के बाद देवताओ ने उनकी पुकार सुन गिलगमेश का संहार करने एंकि-दू भेज जो की गिलगमेश जितना शक्तिशाली था और एक वन्मनव था। वह जंगले में पशुओ के साथ रहता ।
एक दिन एक शिकारी गिलगमेश के पास गया और उसे बताया की एक वन मानुष है जो उनके फंदों से जानवरों को छुड़ा देता है।
गिलगमेश ने एक सुन्दर देवदासी शमश को एंकि-दू को लुभाकर उरुक लाने भेजा क्युकी उस समय यह मन जाता था की शराब और काम वाष्ण आदमी को सब्याता की और ले जा सकती है।
शमश एंकि-दू के साथ रही और उसे सभ्यता की और ले गयी अब एंकि-दू एक वन मानव नहीं एक सभ्य मानव था ।
उरुक पहोच शमश और एंकि-दू ने शादी कर ली ।
कई दिन उरुक ने रहने के बाद एंकि-दू को गिलगमेश के बारे में पता चला और उसके कुकर्मो के बारे में भी।
एंकि-दू गिलगमेश को चुनौती देने गया।
दोनों के बिच घमासान मल्य युद्ध हुआ आखिर में गिलगमेश को उसकी बुरे का एहसास हुआ और दोनों एक दुसरे की शक्ति से प्रवाहित हो मित्र बनगए।

दोनों मित्रो ने कई शहर जीते आखिर में गिलगमेश को देवताओ के देवदार के बाग़ से देवदार चुराने की शुजी ताकि उसकी लकड़ी से उरुक शहर के दरवाजे बनाये जाये।
एंकि-दू ने पहले तो मन किया पर बाद में मान गया।
दोनों मित्र रस्ते की कई बढाओ को पार कर बाग़ तक पहुचे पर एक मुस्किल थी बाग़ की रक्षा हुबाबा करता था जिसे प्राचीन इराक के वायु देव ने बनाया था।
दोनों हुबाबा से लदे आखिर हुबाबा की मृत्यु हो गयी।
दोनों ने मिल देवदार के वृक्ष कटे और कुछ लकड़ियो की सहयता से एक नाव बनाई ताकि वृष उसमे लाद ले जा सके ।
शहर पहोच गिलगमेश ने उसके दरवाजे बनाये इस बिच हुबाबा की मृयु की खबर देवताओ तक पहोची जिसे सुन इश्तार यानि प्यार की देवी गिलगमेश पर मोहित हो गयी और गिलगमेश के पास अपने प्यार का इज़हार करने गयी।
गिलगमेश ने उसे साफ माना कर दिया।
गिलगमेश ने कहा :- हे प्रेम की देवी इश्तार में तुम्हारे पिछले प्रमो के बारे में जानता हु साथ ही ये भी की जैसे ही तुम्हारा उनसे मन उबा वैसे ही उन सब को मृत्यु देखनी पड़ी।
यह सुन इश्तार अपने पिता अनु के पास गयी और उन्हें स्वर्ग का सांड उरुक पर भेजने के लिए कहा ।
अपने पिता के मन करने के बाद इश्तार ने अनु को धमकी दी की यदि उसके कहा अनुसार नहीं हुआ तो वह नर्क का दरवाजा खोल देगी जिससे हजारो जीन्द मृत(Zombies) बहार आयेंगे और तबाही मचा देंगे ।
विवस हो अनु ने उरुक पर सांड भेज दिया। सांड अपने साथ 7 वर्ष का सुखा लाया ।गिलगमेश और एंकि-दू उस सांड से लड़ने गए ,कई दिन लड़ने के बाद आखिर एंकि-दू ने उस सांड के सिंग पकड़ लिए (निचे दी हुई तस्वीर देखे)और गिलगमेश ने उसे मार डाला ।
पर एंकिदू बहोत घायल हो गया बिलकुल अर्ध्मारा सा इसीलिए वह अब शैया पर ही पड़ा रहता।
एक दिन उसे सपना आया की देवताओ ने सभा बुलाई है और वे कह रहे है की हुबाबा और स्वर्ग के सांड को मरने की वजह से गिलगमेश और एंकि दू ने अपरद किया है इसीलिए इन्हें सजा मिलनी चाहिए मृत्युदंड की पर गिलगमेश सुधर गया है उसे मरना सही नहीं रहेगा पर एंकिदू को तो गिलगमेश का संहार करने के लिए भेज था और अब जोकि गिलगमेश सुधर गया तो एंकिदू का कुछ काम नहीं ,उसका जीवन का लक्ष्य समाप्त हो गया है इसीलिए उसे मृत्युदंड दी जाए।
एंकिदू सपना देख खुदको कोसने लगा ।
वह कहता :- “क्यों में इस निर्दयी मानव दुनिया में आया मैं जंगले में उन पशुओ के साथ ज्यादा सुखी था ।
ह वह नारी शमश क्यों में उसके जाल में फसा नहीं उसके जसल में मैं फास्ता और नाही में उरुक आता।
पर वाही थी जिसने मुझे रोटी दी खाने के लिए और दूध दिया उसने मेरा कितना क्या रखा ,भगवन उसे सदा सुखी रखे।
और गिलगमेश मेरा मित्र मेरा भाई ओह उसने क्या क्या नहीं किया मेरे लिए। मेरे मरन उपरांत वह मेरे लिए सबसे सुन्दर शैया लायेगा। स्वर्ग में मेरा कयल रखने के लिए कई दसिय और रखेल भेजेगा (उस वक़्त किसी आमिर या राजा के साथ जिन्दा रखैले और दास दासिया दफनाई जाती क्युकी यह मन जस्ता था मरने के बाद स्वर्ग में उनकी आवश्कता पड़ेगी )भगवन उसे सदैव जीत दिलाये ।”
यह बात एंकिदू ने गिलगमेश को बताई ,गिलगमेश दुखी हो गया पर वह एंकिदू को दिलासा देता रहा की वह जीवित रहेंगा ।
एंकिदू बहोत बीमार पद गया और आखिर मर गया ।गिलगमेश उसके पास ही था ,उसके मरने के बाद वह उसे जगाने की कोशिस करता पर एंकिदू कुछ नहीं कहता,गिलगमेश ने एंकिदू की दिल की धड़कन देखि वह रुक चुकी थी।
कई दिन तक गिलगमेश उसकी लाश के बाजू में रहा आखिर जब एंकिदू की लाश सड़ने लगी और कीड़े उसे खाने लगे तब गिलगमेश ने उसे सम्मान सहित दफना दिया।
गिलगमेश को दक्खा लगे अपने मित्र की मौत पर वह सोचने लगा जिस कदर उसका प्यारा मित्र मरा क्या उसी कदर वह मरेगा ,गिलगमेश जीना चाहता था वह अमर होना चाहता था तब उसे अपने बड़े बुडो की कहानी याद आई जिउसुद्दु की जो की मनु का इराकी स्वरुप था।उसे याद आया स्वयं देवताओ ने उसे अमरता का राज बताया था ,गिलगमेश उसी का वंशज था जिउसुद्दु उसकी सहयता जरुर करेगा।
गिलगमेश दुनिया के आखिरी छोर की खोज में निकला जहा जिउसुद्दु रहता था।
कई महीनो तक चलने के बाद उसकी हालत भी एंकिदू सी हो गयी,वह स्वयं एंकिदू नजात आता। उसके सारे वस्त्र निकल गए थे और सरीर पर बड़े बड़े बाल आ गए थे।
गिलगमेश दो पहाड़ी के यहाँ पहोचा। उन पहाडियों के बीचो बिच एक गुफा थी जो जिउसिद्दु के घर की ओर जाता पर दो विशाल बिछुओ ने उसका रास्ता रोक लिया ।दोनों से युद्ध कर उन दोनों को गिलगमेश ने मर डाला और गुफा में चला गया।
गुफा में काफी अँधेरा था,बहोत दूर चलने के बाद एक छोर उसे रोशनी नजर आई। उसरी तरफ पहोच उसे एक सुन्दर बाग़ नजर आया ,बाग़ के पास एक सागर था जिसका नाम मृत्यु सागर था और उसके बिच में एक द्वीप पर था जिउसुद्दु का घर।
वह सागर के किनारे पहोच तो एक जल देवी  आई और उसे रोकते हुए बोली की चले जाओ वापस। गिलगमेश ने उसे वह आने का कारन बताया जिसे सुन उस देवी ने उसे समझाया पर वह नहीं माना और आगे चल दिया।
उसे सागर के किनारे एक नाव मिली इसमें जिउसुद्दु माझी था,उस माझी ने भी गिलगमेश को लाख समझाया पर वो मन नहीं आखिर माझी उसे जिउसिद्दु के पास ले गया।
जिउसुद्दु ने गिलगमेश को देखा तो कुश हुआ पर उसकी इच्छा सुन चिंतित हो गया।
गिलगमेश की जिद के बाद जिउसुद्दु मान गया पर एक शर्त राखी ,गिलगमेश को पूरा एक सप्ता बिना सोये बिताना था पर आखिर कुछ दिन न सोने की की कोशिश करने के बाद वह सो गया।
दुखी हो गिलगमेश जाने लगा पर जिउसुद्दु की बीवी ने जिउसिद्दु को गिलगमेश की थोड़ी मदत करने के लिए कहा ।
जिउसुद्दु ने गिलगमेश को रोका और उसे पास ही के अमृत सागर में जसने को कहा जिसकी ताल हटी में एक औषदी थी जो उसको दुबारा जवान बना देगी (बबुली और दुसरे इराकी की शहरों की कहानी अनुसार यह औषदी अमृत्व प्रदान करती है .यह पूरी तरह से सुमेरी कहानी है जो सबसे पहली और असली है )
गिलगमेश अमृत सागर गया और औषद प्राप्त कर उरुक की और गया।
उरुक जाते समय एक तलब आया रस्ते पर तो गिलगमेश उसमे नहाने के लिए गया।
पास ही एक सर्प था जो औषदी की गंद से मोहित हो गया और उसे खा गया। अब सर्प जवान और पहले से अधिक शक्तिशाली बन गया ।उसकी पुराणी केचुली उतर गयी और एक हस्त पुस्त सर्प निकला जो चला गया।
नहाके आने के बाद गिलगमेश ने पाया की औषदी वहा नहीं है साथ ही वहा सर्प की केचुली थी ।वह समझ गया क्या हुआ ।
उसे बहोत दुःख हुआ की उसकी मेहनत एक रेंगने वाले जीव ने नस्त कर दी ।
गिलगमेश उरुक पंहुचा उदास मन से और वह शाशन करने लगा,उसे एहसास हुआ की जग जितना आसन है पर दिल जीतना कठिन इसीलिए अब वह लोगो की भलाई का काम करता ।
कई साल बिड गए और गिलगमेश वृद्ध हो गया उसे अब यह चिंता सताने लगी की उसकी मृत्यु के बाद उसके शारीर और आत्मा का क्या होगा ।
गिलगमेश ने देवता नर्गल को याद किया। नर्गल ने उसे सरीर सहित नर्क में पंहुचा दिया। वहा वह भाधाए पर कर और नर्क के रक्षक को हराकर आगे बड़ा और उसे आखिर एंकिदू की आत्मा मिली।
नर्गल ने भूमि में दरार करदी जिस कारन दोनों मित्र नर्क से बहार आ गए।
गिलगमेश ने एंकिदू से अपना सवाल किया ,जवाब में एंकिदू ने कहा की गिलगमेश इसे सुन नहीं पायेंग पर गिलगमेश की जिद के कारन उसने बताया की इस सरीर को कीड़े खा जाते है और आत्मा पृथ्वी पर भटक मल और सदा हुआ पानी पीती है यदि उसकी कब्र पर रोज आहार न रखा जाये।
कुछ साल पहले तक यही कहानी का अंत मन जाता था की गिलगमेश को मरने के बाद होने वाले कास्ट का पता चलता है पर अभी अभी एक और ईट मिली है जिसके अनुशार गिलगमेश की भी मौत होती है और उसकी आत्मा नर्क में जाती है पर अछे कर्मो के कारन उसे नर्क का न्यायधीश(जज) बना दिया जाता है ।
जय माँ भारती

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