नवरात्रि पर दुर्गा पूजन का कार्यक्रम

Mother goddess Durga

नवरात्रि पर दुर्गा पूजन का कार्यक्रम

पंचांग के अनुसार नवरात्रि का पर्व आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से आरंभ होगा, जो 17 अक्टूब को पड़ रही है. इस दिन सूर्य कन्या राशि में चंद्रमा तुला राशि में विराजमान रहेंगे। नवरात्रि के प्रथम दिन घटस्थापना का शुभ मुहूर्त प्रात: 6 बजकर 23 मिनट से प्रात: 10 बजकर 12 मिनट तक है।

नवरात्रि का तिथि वार पूजा कार्यक्रम इस प्रकार रहेगा-

17 अक्टूबर: प्रतिपदा घटस्थापना

18 अक्टूबर: द्वितीया मां ब्रह्मचारिणी पूजा

19 अक्टूबर: तृतीय मां चंद्रघंटा पूजा

20 अक्टूबर: चतुर्थी मां कुष्मांडा पूजा

21 अक्टूबर: पंचमी मां स्कंदमाता पूजा

22 अक्टूबर: षष्ठी मां कात्यायनी पूजा

23 अक्टूबर: सप्तमी मां कालरात्रि पूजा

24 अक्टूबर: अष्टमी मां महागौरी दुर्गा महा नवमी पूजा दुर्गा महा अष्टमी पूजा

25 अक्टूबर: नवमी मां सिद्धिदात्री नवरात्रि पारण विजय दशमी

नवरात्रि पर्व हिन्दू धर्म के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व है। इस पावन अवसर पर माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना की जाती है। इसलिए यह पर्व नौ दिनों तक मनाया जाता है। वेद-पुराणों में माँ दुर्गा को शक्ति का रूप माना गया है जो असुरों से इस संसार की रक्षा करती हैं। नवरात्र के समय माँ के भक्त उनसे अपने सुखी जीवन और समृद्धि की कामना करते हैं।

आइए जानते हैं माँ दुर्गा के नौ रूप कौन-कौन से हैं :-

1. माँ शैलपुत्री

2. माँ ब्रह्मचारिणी

3. माँ चंद्रघण्टा

4. माँ कूष्मांडा

5. माँ स्कंद माता

6. माँ कात्यायनी

7. माँ कालरात्रि

8. माँ महागौरी

9. माँ सिद्धिदात्री

सनातन धर्म में नवरात्र पर्व का बड़ा महत्व है कि यह एक साल में पाँच बार मनाया जाता है। हालाँकि इनमें चैत्र और शरद के समय आने वाली नवरात्रि को ही व्यापक रूप से मनाया जाता है। इस अवसर पर देश के कई हिस्सों में मेलों और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। माँ के भक्त भारत वर्ष में फैले माँ के शक्ति पीठों के दर्शन करने जाते हैं। वहीं शेष तीन नवरात्रियों को गुप्त नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। इनमें माघ गुप्त नवरात्रि, आषाढ़ गुप्त नवरात्रि और पौष नवरात्रि शामिल हैं। इन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में सामान्य रूप से मनाया जाता है।

नवरात्रि पर्व का महत्व

यदि हम नवरात्रि शब्द का संधि विच्छेद करें तो ज्ञात होता है कि यह दो शब्दों के योग से बना है जिसमें पहला शब्द ‘नव’ और दूसरा शब्द ‘रात्रि’ है जिसका अर्थ है नौ रातें। नवरात्रि पर्व मुख्य रूप से भारत के उत्तरी राज्यों के अलावा गुजरात और पश्चिम बंगाल में बड़ी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर माँ के भक्त उनका आशीर्वाद पाने के लिए नौ दिनों का उपवास रखते हैं।

इस दौरान शराब, मांस, प्याज, लहसुन आदि चीज़ों का परहेज़ किया जाता है। नौ दिनों के बाद दसवें दिन व्रत पारण किया जाता है। नवरात्र के दसवें दिन को विजयादशमी या दशहरा के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि इसी दिन भगवान श्री राम ने रावण का वध करके लंका पर विजय पायी थी।

नवरात्रि से जुड़ी परंपरा

भारत सहित विश्व के कई देशों में नवरात्रि पर्व को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भक्तजन घटस्थापना करके नौ दिनों तक माँ की आराधना करते हैं। भक्तों के द्वारा माँ का आशीर्वाद पाने के लिए भजन कीर्तन किया जाता है। नौ दिनों तक माँ की पूजा उनके अलग अलग रूपों में की जाती है। जैसे –

नवरात्रि का पहला दिन माँ शैलपुत्री को होता है समर्पित

नवरात्रि के पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है। माँ पार्वती माता शैलपुत्री का ही रूप हैं और हिमालय राज की पुत्री हैं। माता नंदी की सवारी करती हैं। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बायें हाथ में कमल का फूल है। नवरात्रि के पहले दिन लाल रंग का महत्व होता है। यह रंग साहस, शक्ति और कर्म का प्रतीक है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना पूजा का भी विधान है।

नवरात्रि का दूसरा दिन माँ ब्रह्मचारिणी के लिए है

नवरात्रि का दूसरा दिन माता ब्रह्मचारिणी को समर्पित होता है। माता ब्रह्मचारिणी माँ दुर्गा का दूसरा रूप हैं। ऐसा कहा जाता है कि जब माता पार्वती अविवाहित थीं तब उनको ब्रह्मचारिणी के रूप में जाना जाता था। यदि माँ के इस रूप का वर्णन करें तो वे श्वेत वस्त्र धारण किए हुए हैं और उनके एक हाथ में कमण्डल और दूसरे हाथ में जपमाला है। देवी का स्वरूप अत्यंत तेज़ और ज्योतिर्मय है। जो भक्त माता के इस रूप की आराधना करते हैं उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन का विशेष रंग नीला है जो शांति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघण्टा की होती है पूजा

नवरात्र के तीसरे दिन माता चंद्रघण्टा की पूजा की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है कि माँ पार्वती और भगवान शिव के विवाह के दौरान उनका यह नाम पड़ा था। शिव के माथे पर आधा चंद्रमा इस बात का साक्षी है। नवरात्र के तीसरे दिन पीले रंग का महत्व होता है। यह रंग साहस का प्रतीक माना जाता है।

नवरात्रि के चौथे दिन माँ कुष्माण्डा की होती है आराधना

नवरात्रि के चौथे दिन माता कुष्माडा की आराधना होती है। शास्त्रों में माँ के रूप का वर्णन करते हुए यह बताया गया है कि माता कुष्माण्डा शेर की सवारी करती हैं और उनकी आठ भुजाएं हैं। पृथ्वी पर होने वाली हरियाली माँ के इसी रूप के कारण हैं। इसलिए इस दिन हरे रंग का महत्व होता है।

नवरात्रि का पाँचवां दिन माँ स्कंदमाता को है समर्पित

नवरात्र के पाँचवें दिन माँ स्कंदमाता का पूजा होता है। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार भगवान कार्तिकेय का एक नाम स्कंद भी है। स्कंद की माता होने के कारण माँ का यह नाम पड़ा है। उनकी चार भुजाएँ हैं। माता अपने पुत्र को लेकर शेर की सवारी करती है। इस दिन धूसर (ग्रे) रंग का महत्व होता है।

नवरात्रि के छठवें दिन माँ कात्यायिनी की होती है पूजा

माँ कात्यायिनी दुर्गा जी का उग्र रूप है और नवरात्रि के छठे दिन माँ के इस रूप को पूजा जाता है। माँ कात्यायिनी

नवरात्र के सातवें दिसाहस का प्रतीक हैं। वे शेर पर सवार होती हैं और उनकी चार भुजाएं हैं। इस दिन केसरिया रंग का महत्व होता है।

नवरात्रि के सातवें दिन करते हैं माँ कालरात्रि की पूजा

माँ के उग्र रूप माँ कालरात्रि की आराधना होती है। पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि जब माँ पार्वती ने शुंभ-निशुंभ नामक दो राक्षसों का वध किया था तब उनका रंग काला हो गया था। हालाँकि इस दिन सफेद रंग का महत्व होता है।

नवरात्रि के आठवें दिन माँ महागौरी की होती है आराधना

महागौरी की पूजा नवरात्रि के आठवें दिन होती है। माता का यह रूप शांति और ज्ञान की देवी का प्रतीक है। इस दिन गुलाबी रंग का महत्व होता है जो जीवन में सकारात्मकता का प्रतीक होता है।

नवरात्रि का अंतिम दिन माँ सिद्धिदात्री के लिए है समर्पित

नवरात्रि के आखिरी दिन माँ सिद्धिदात्री की आराधना होती है। ऐसा कहा जाता है कि जो कोई माँ के इस रूप की आराधना सच्चे मन से करता है उसे हर प्रकार की सिद्धि प्राप्त होती है। माँ सिद्धिदात्री कमल के फूल पर विराजमान हैं और उनकी चार भुजाएँ हैं।

नवरात्रि के लिए पूजा सामग्री

● माँ दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र

● लाल चुनरी

● आम की पत्तियाँ

● चावल

● दुर्गा सप्तशती की किताब

● लाल कलावा

● गंगा जल

● चंदन

● नारियल

● कपूर

● जौ के बीच

● मिट्टी का बर्तन

● गुलाल

● सुपारी

● पान के पत्ते

● लौंग

● इलायची

नवरात्रि पूजा विधि

● सुबह जल्दी उठें और स्नान करने के बाद स्वच्छ कपड़े पहनें

● ऊपर दी गई पूजा सामग्री को एकत्रित करें

● पूजा की थाल सजाएँ

● माँ दर्गा की प्रतिमा को लाल रंग के वस्त्र में रखें

● मिट्टी के बर्तन में जौ के बीज बोयें और नवमी तक प्रति दिन पानी का छिड़काव करें

● पूर्ण विधि के अनुसार शुभ मुहूर्त में कलश को स्थापित करें। इसमें पहले कलश को गंगा जल से भरें, उसके मुख पर आम की पत्तियाँ लगाएं और उपर नारियल रखें। कलश को लाल कपड़े से लपेंटे और कलावा के माध्यम से उसे बाँधें। अब इसे मिट्टी के बर्तन के पास रख दें

● फूल, कपूर, अगरबत्ती, ज्योत के साथ पंचोपचार पूजा करें

● नौ दिनों तक माँ दुर्गा से संबंधित मंत्र का जाप करें और माता का स्वागत कर उनसे सुख-समृद्धि की कामना करें

● अष्टमी या नवमी को दुर्गा पूजा के बाद नौ कन्याओं का पूजन करें और उन्हें तरह-तरह के व्यंजनों (पूड़ी, चना, हलवा) का भोग लगाएं

● आखिरी दिन दुर्गा के पूजा के बाद घट विसर्जन करें इसमें माँ की आरती गाएं, उन्हें फूल, चावल चढ़ाएं और बेदी से कलश को उठाएं

भारत में इस तरह मनाया जाता है नवरात्रि का पावन पर्व 

नवरात्रि के पावन अवसर पर माँ दुर्गा के लाखों भक्त उनकी हृदय से पूजा-आराधना करते हैं। ताकि उन्हें उनकी श्रद्धा का फल माँ के आशीर्वाद के रूप में मिल सके। नवरात्रि के दौरान माँ के भक्त अपने घरों में का माँ का दरवार सजाते हैं। उसमें माता के विभिन्न रूपों की प्रतिमा या चित्र को रखा जाता है। नवरात्रि के दसवें दिन माँ की प्रतिमा को बड़ी धूमधाम के साथ जल में प्रवाह करते हैं। पश्चिम बंगाल में सिंदूर खेला की प्रथा चलती है। जिसमें महिलाएँ एक दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। गुजरात में गरबा नृत्य का आयोजन किया जाता है। जिसमें लोग डांडिया नृत्य करते हैं। उत्तर भारत में नवरात्रि के समय जगह-जगह रामलीला का आयोजन होता है और दसवें दिन रावण के बड़े-बड़े पुतले बनाकर उन्हें फूंका जाता है।

नवरात्रि से संबंधित पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार कहा जाता है कि महिषासुर नामक राक्षस ब्रह्मा जी का बड़ा भक्त था। उसकी भक्ति को देखकर शृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी प्रसन्न हो गए और उसे यह वरदान दे दिया कि कोई देव, दानव या पुरुष उसे मार नहीं पाएगा। इस वरदान को पाकर महिषासुर के अंदर अहंकार की ज्वाला भड़क उठी। वह तीनों लोकों में अपना आतंक मचाने लगा।

इस बात से तंग आकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ सभी देवताओं ने मिलकर माँ शक्ति के रूप में दुर्गा को जन्म दिया। कहते हैं कि माँ दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ और दसवें दिन माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। इस दिन को अच्छाई पर बुराई की जीत के रूप में मनाया जाता है।

एक दूसरी कथा के अनुसार, त्रेता युग में भगवान राम ने लंका पर आक्रमण करने से पहले शक्ति की देवी माँ भगवती की आराधना की थी। उन्होंने नौ दिनों तक माता की पूजा की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माँ स्वयं उनके सामने प्रकट हो गईं। उन्होंने श्रीराम को विजय प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। दसवें दिन भगवान राम ने अधर्मी रावण को परास्त कर उसका वध कर लंका पर विजय प्राप्त की। इस दिन को विजय दशमी के रूप में जाना जाता है।

Vedic watch #वैदिक_घड़ी

वैदिक_घड़ी

देखिये आपकी घड़ी क्या कहती है –

  • १२:०० बजने के स्थान पर आदित्या: लिखा हुआ है, जिसका अर्थ यह है कि सूर्य १२ प्रकार के होते हैं – अंशुमान, अर्यमन, इंद्र, त्वष्टा, धातु, पर्जन्य, पूषा, भग, मित्र, वरुण, विवस्वान और विष्णु।
  • १:०० बजने के स्थान पर ब्रह्म लिखा हुआ है, इसका अर्थ यह है कि ब्रह्म एक ही प्रकार का होता है।
    एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति।
  • २:०० बजने की स्थान पर अश्विनौ लिखा हुआ है, जिसका तात्पर्य यह है कि अश्विनी कुमार दो हैं।
  • ३:०० बजने के स्थान पर त्रिगुणा: लिखा हुआ है, जिसका तात्पर्य यह है कि गुण तीन प्रकार के हैं – सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण।

४:०० बजने के स्थान पर चतुर्वेदा: लिखा हुआ है, जिसका तात्पर्य यह है कि वेद चार प्रकार के होते हैं – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।

५:०० बजने के स्थान पर पंचप्राणा: लिखा हुआ है, जिसका तात्पर्य है कि प्राण पांच प्रकार के होते हैं – अपान, समान, प्राण, उदान और व्यान।

६:०० बजने के स्थान पर षड्र्सा: लिखा हुआ है, इसका तात्पर्य है कि रस 6 प्रकार के होते हैं – मधुर, अमल, लवण, कटु, तिक्त और कसाय।

७:०० बजे के स्थान पर सप्तर्षय: लिखा हुआ है, इसका तात्पर्य है कि सप्त ऋषि 7 हुए हैं – कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ।

८:०० बजने के स्थान पर अष्ट सिद्धिय: लिखा हुआ है, इसका तात्पर्य है कि सिद्धियां आठ प्रकार की होती है – अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्व और वशित्व।

९:०० बजने के स्थान पर नव द्रव्यणि अभियान लिखा हुआ है इसका तात्पर्य है कि 9 प्रकार की निधियां होती हैं – पद्म, महापद्म, नील, शंख, मुकुंद, नंद, मकर, कच्छप, खर्व।

१०:०० बजने के स्थान पर दशदिशः लिखा हुआ है, इसका तात्पर्य है कि दिशाएं 10 होती है – पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, नैऋत्य, वायव्य, आग्नेय, आकाश, पाताल।

११:०० बजने के स्थान पर रुद्रा: लिखा हुआ है, इसका तात्पर्य है कि रुद्र 11 प्रकार के हुए हैं – कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, अहिर्बुध्न्य, शम्भु, चण्ड और भव।

सत्य सनातन संस्कृति में हर चीज हमें कुछ न कुछ सिखाती अवश्य है।

पुष्यमित्र शुंग,महान हिन्दू सम्राट जिसने भारत को बुद्ध देश बनने से बचाया।

ब्राह्मण सम्राट पुष्यमित्र शुंग

जिसमाथेपरतिलकनादिखावोसिरधड़सेअलगकरदिया_जाएगा — पुष्यमित्र शुंग

बात आज से 2100 साल पहले की है।

एक किसान ब्राह्मण के घर एक पुत्र ने जन्म लिया। नाम रखा गया पुष्यमित्र।
पूरा नाम पुष्यमित्र शुंग।
और वो बना एक महान हिन्दू सम्राट जिसने भारत को बुद्ध देश बनने से बचाया। अगर ऐसा कोई राजा कम्बोडिया, मलेशिया या इंडोनेशिया में जन्म लेता तो आज भी यह देश हिन्दू होते।
जब सिकन्दर राजा पोरस से मार खाकर अपना विश्व विजय का सपना तोड़ कर उत्तर भारत से शर्मिंदा होकर मगध की और गया था उसके साथ आये बहुत से यवन वहां बस गए। अशोक सम्राट के बुद्ध धर्म अपना लेने के बाद उनके वंशजों ने भारत में बुद्ध धर्म लागू करवा दिया। ब्राह्मणों के द्वारा इस बात का सबसे अधिक विरोध होने पर उनका सबसे अधिक कत्लेआम हुआ। हज़ारों मन्दिर गिरा दिए गए। इसी दौरान पुष्यमित्र के माता पिता को धर्म परिवर्तन से मना करने के कारण उनके पुत्र की आँखों के सामने काट दिया गया। बालक चिल्लाता रहा मेरे माता पिता को छोड़ दो। पर किसी ने नही सुनी। माँ बाप को मरा देखकर पुष्यमित्र की आँखों में रक्त उतर आया। उसे गाँव वालों की संवेदना से नफरत हो गयी। उसने कसम खाई की वो इसका बदला बौद्धों से जरूर लेगा और जंगल की तरफ भाग गया।
एक दिन मौर्य नरेश बृहद्रथ जंगल में घूमने को निकला। अचानक वहां उसके सामने शेर आ गया। शेर सम्राट की तरफ झपटा। शेर सम्राट तक पहुंचने ही वाला था की अचानक एक लम्बा चौड़ा बलशाली भीमसेन जैसा बलवान युवा शेर के सामने आ गया। उसने अपनी मजबूत भुजाओं में उस मौत को जकड़ लिया। शेर को बीच में से फाड़ दिया और सम्राट को कहा की अब आप सुरक्षित हैं। अशोक के बाद मगध साम्राज्य कायर हो चुका था। यवन लगातार मगध पर आक्रमण कर रहे थे। सम्राट ने ऐसा बहादुर जीवन में ना देखा था। सम्राट ने पूछा ” कौन हो तुम”। जवाब आया ” ब्राह्मण हूँ महाराज”। सम्राट ने कहा “सेनापति बनोगे”? पुष्यमित्र ने आकाश की तरफ देखा, माथे पर रक्त तिलक करते हुए बोला “मातृभूमि को जीवन समर्पित है”। उसी वक्त सम्राट ने उसे मगध का उपसेनापति घोषित कर दिया।
जल्दी ही अपने शौर्य और बहादुरी के बल पर वो सेनापति बन गया। शांति का पाठ अधिक पढ़ने के कारण मगध साम्राज्य कायर ही चूका था। पुष्यमित्र के अंदर की ज्वाला अभी भी जल रही थी। वो रक्त से स्नान करने और तलवार से बात करने में यकीन रखता था। पुष्यमित्र एक निष्ठावान हिन्दू था और भारत को फिर से हिन्दू देश बनाना उसका स्वपन था।
आखिर वो दिन भी आ गया। यवनों की लाखों की फ़ौज ने मगध पर आक्रमण कर दिया। पुष्यमित्र समझ गया की अब मगध विदेशी गुलाम बनने जा रहा है। बौद्ध राजा युद्ध के पक्ष में नही था। पर पुष्यमित्र ने बिना सम्राट की आज्ञा लिए सेना को जंग के लिए तैयारी करने का आदेश दिया। उसने कहा की इससे पहले दुश्मन के पाँव हमारी मातृभूमि पर पड़ें हम उसका शीश उड़ा देंगे। यह नीति तत्कालीन मौर्य साम्राज्य के धार्मिक विचारों के खिलाफ थी।
सम्राट पुष्यमित्र के पास गया। गुस्से से बोला ” यह किसके आदेश से सेना को तैयार कर रहे हो”। पुष्यमित्र का पारा चढ़ गया। उसका हाथ उसके तलवार की मुठ पर था। तलवार निकालते ही बिजली की गति से सम्राट बृहद्रथ का सर धड़ से अलग कर दिया और बोला ” ब्राह्मण किसी की आज्ञा नही लेता”।
हज़ारों की सेना सब देख रही थी। पुष्यमित्र ने लाल आँखों से सम्राट के रक्त से तिलक किया और सेना की तरफ देखा और बोला
“ना बृहद्रथ महत्वपूर्ण था,………
ना पुष्यमित्र………..
महत्वपूर्ण है तो मगध,
महत्वपूर्ण है तो मातृभूमि,

क्या तुम रक्त बहाने को तैयार हो??”।
उसकी शेर सी गरजती आवाज़ से सेना जोश में आ गयी। सेनानायक आगे बढ़ कर बोला “हाँ सम्राट पुष्यमित्र । हम तैयार हैं”। पुष्यमित्र ने कहा” आज मैं सेनापति ही हूँ।चलो काट दो यवनों को।”।
जो यवन मगध पर अपनी पताका फहराने का सपना पाले थे वो युद्ध में गाजर मूली की तरह काट दिए गए। एक सेना जो कल तक दबी रहती थी आज युद्ध में जय महाकाल के नारों से दुश्मन को थर्रा रही है। मगध तो दूर यवनों ने अपना राज्य भी खो दिया। पुष्यमित्र ने हर यवन को कह दिया की अब तुम्हे भारत भूमि से वफादारी करनी होगी नही तो काट दिए जाओगे।
इसके बाद पुष्यमित्र का राज्यभिषेक हुआ। उसने सम्राट बनने के बाद घोषणा की अब कोई मगध में बुद्ध धर्म को नही मानेगा। हिन्दू ही राज धर्म होगा। उसने साथ ही कहा
“जिसके माथे पर तिलक ना दिखा वो सर धड़ से अलग कर दिया जायेगा”।
उसके बाद पुष्यमित्र ने वो किया जिससे आज भारत कम्बोडिया नही है। उसने लाखों बौद्धों को मरवा दिया। बुद्ध मन्दिर जो हिन्दू मन्दिर गिरा कर बनाये गए थे उन्हें ध्वस्त कर दिया। बुद्ध मठों को तबाह कर दिया। चाणक्य काल की वापसी की घोषणा हुई और तक्षिला विश्विद्यालय का सनातन शौर्य फिर से बहाल हुआ।
शुंग वंशवली ने कई सदियों तक भारत पर हुकूमत की। पुष्यमित्र ने उनका साम्राज्य पंजाब तक फैला लिया।
इनके पुत्र सम्राट अग्निमित्र शुंग ने अपना साम्राज्य तिब्बत तक फैला लिया और तिब्बत भारत का अंग बन गया। वो बौद्धों को भगाता चीन तक ले गया। वहां चीन के सम्राट ने अपनी बेटी की शादी अग्निमित्र से करके सन्धि की। उनके वंशज आज भी चीन में “शुंग” surname ही लिखते हैं।
पंजाब- अफ़ग़ानिस्तान-सिंध की शाही ब्राह्मण वंशवली के बाद शुंग शायद सबसे बेहतरीन ब्राह्मण साम्राज्य था। शायद पेशवा से भी महान।

By jagbir singh

और इस तरह से नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सीट थाली में सजा कर चीन को दे दी

जब भी चीन के साथ भारत का तनाव होता है तब आज़ाद भारत के पहले पीएम नेहरू का जिक्र जरूर आता है. नेहरू की गलतियों को भारत आज़ादी के इतने सालों बाद भी भुगत रहा है. नेहरू की नीतियों के कारण भारत ने अपना बड़ा भूभाग गंवाया. ये नेहरू की नीति ही थी कि उन्होंने हाथ में आई हुई संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की सीट थाली में सजा कर चीन को सौंप दिया. आज हम नेहरू की इसी ऐतिहासिक गलती की कहानी जानेंगे जिसे कभी भूला नहीं जा सकता और न माफ़ किया जा सकता है.

संयुक्त राष्ट्र संघ का जब गठन हुआ और उसके सदस्य बनाये जा रहे थे तब भारत आज़ाद नहीं हुआ था. ये बात है 1945 की. सैन फ्रांसिस्को में शुरू हुए और दो महीनों तक चले 50 देशों के संयुक्त राष्ट्र स्थापना सम्मेलन में भारत के भी प्रतिनिधि भाग ले रहे थे. उन दिनों चीन गृह युद्ध में उलझा था. च्यांग काई शेक की कुओमितांग पार्टी और माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच खुनी संघर्ष चल रहा था. 1949 में जब चीन के गृहयुद्ध में कम्युनिस्ट पार्टी की जीत हुई तो च्यांग काई शेक को अपने समर्थकों के साथ भाग कर ताइवान द्वीप पर शरण लेनी पड़ी. कुओमितांग पार्टी ने ताइवान में रिपब्लिक ऑफ़ चाइना सरकार का गठन किया और दावा किया कि वही असली चीन है. माओ त्से तुंग ने मुख्य भूमि वाले चीन का नाम रखा पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना. चूँकि संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र पर 1945 में रिपब्लिक ऑफ़ चाइना के नाम का हस्ताक्षर था इसलिए संयुक्त राष्ट्र ने माओ त्से तुंग के कब्जे वाली पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना को यह सीट देने से इनकार कर दिया था और ताइवान को सीट दे दी गई.

1947 में भारत आज़ाद हुआ तो नेहरू ने प्रधानमंत्री के साथ साथ विदेश मंत्री का पदभार भी संभाला. वो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और रूस की साम्यवादी विचारधारा से बहुत ही अधिक प्रभावित थे. इसलिए जब 1949 में माओ त्से तुंग ने कुओमितांग पार्टी को खदेड़ कर पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना का गठन किया तो उसे सबसे पहले मान्यता देने वालों में भारत भी था.. नेहरू को भरोसा था कि एक दिन भारत और चीन दोस्ती की नयी मिसाल बनायेंगे. उन्हें यकीन था हिंदी चीनी भाई भाई बनेंगे.

साल 1950, आज़ादी के बाद भारत एक बहुदलीय लोकतंत्र बन कर उभरा, जनसँख्या की दृष्टि से भारत उस वक़्त भी दूसरा सबसे बड़ा देश था. जबकि ताइवान भारत के मुकाबले एक बहुत ही छोटा द्वीप. उन्ही दिनों अमेरिका के सियासी गलियारों में ये चर्चा उठने लगी कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सीट ताइवान से लेकर भारत को दे दिया जाए. इस बात का जिक्र पंडित नेहरू की बहन विजय लक्ष्मीपंडित ने अमेरिका से लिखी एक चिट्ठी में किया. उस वक़्त विजयलक्ष्मी पंडित अमेरिका में भारत की राजदूत थीं. उन्होंने नेहरू को चिट्ठी लिखते हुए कहा कि वाशिंगटन में ये चर्चा चल रही है भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की सीट दे दी जाए. उन्होंने चिट्ठी में ये भी लिखा कि नेहरू को इस अवसर का फायदा उठाना चाहिए. लेकिन नेहरू का मानना था कि इस सीट पर चीन का अधिकारी है और ताइवान से लेकर वो सीट चीन को दे देनी चाहिए. नेहरू का ये भी मानना था कि चीन की सीट ताइवान को देना चीन के लिए अपमानजनक बात होगी. उनका ये भी मानना था कि अगर भारत ने वो सीट स्वीकार की तो भारत और चीन के रिश्ते बिगड़ जायेंगे. इस बात का जिक्र उन्होंने अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित की चिट्ठी के जवाब में लिखा. नेहरू का ये भी मानना था कि भारत सुरक्षा परिषद् की सीट का हकदार तो है लेकिन जब चीन को उसका अधिकार नहीं मिल जाता तब तक भारत अपना अधिकार स्वीकार नहीं कर सकता.

नेहरू किसी भी कीमत पर चीन की दोस्ती खोना नहीं चाहते थे और उन्होंने इसके लिए देशहित जो ताक पर रख दिया. अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषक आज भी मानते हैं कि नेहरू ने एक ऐसी गलती कि जो कोई भी देश नहीं करता, कम से कम अपने हितों की तिलांजलि दे कर तो कतई नहीं. ये वही बात हो गई कि भले हमको खुद नंगा रहना पड़े लेकिन अपने ऊपर का कपडा उतार कर हम दूसरों को दान कर दे और नेहरू इसी नीति का पालन कर रहे थे. नेहरू जिसे अपनी नीति मानते थे वो दरअसल उनकी नीति नहीं गलती थी. देश आज भी इसके परिणाम भुगत रहा है.

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अजमेर ( राजस्थान ) -ख्वाजा मोइद्दीन चिश्ती

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आज हिन्दुओं के मूर्खता का आलम यह है कि….. आज #अजमेर ( राजस्थान ) को….. #ख्वाजा मोइद्दीन चिश्ती के दरगाह के लिए ज्यादा जाना जाता है….. और, लोग अजमेर उसी की दरगाह पर चादर चढाने हेतु जाया करते हैं…!
लेकिन…. आपको यह जान कर हैरानी मिश्रित दुःख की अनुभूति होगी कि….. उसी अजमेर से लगभग 11 किलोमीटर दूर पुष्कर झील है…. जिसके पास ही एक अतिप्राचीन (14 वीं सदी का ) भगवान ब्रम्हा का एकमात्र मंदिर है…. और, कहा जाता है कि….. बिना पुष्कर झील में स्नान किये…. चारो धाम ( केदारनाथ, बद्रीनाथ , रामेश्वरम और द्वारका ) की यात्रा भी पूर्ण नहीं हो पाती है…!
फिर भी हिन्दुजन अपने मूर्खता से वशीभूत होकर … ऐसे पवित्र उपासना स्थल की अवहेलना कर…. मोइद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चादर चढाने को ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं….!
जहाँ तक बात रही ख्वाजा (???) मोइद्दीन चिश्ती की …. तो भारत में इस सूफी की ख्याति… कदाचित सबसे अधिक है…!
इस सूफी को … महान संत… देवता का अवतार….. धर्मनिरपेक्षता … और, भारत के गंगा-जमुना की सम्मिलित संस्कृति की साक्षात् मूर्ति कहा जाता है…..!
छोटे लोगों की तो बात ही जाने दें….. हमारे प्रधानमंत्री… और, राष्ट्रपति तक भी इसके मजार पर जा कर शीश नवाने और…. चादर चढाने में गर्व की अनुभूति करते हैं….!
लेकिन…. बहुत कम लोगों को ही ये मालूम है कि…… इस व्यक्ति ने भारत के इस्लामीकरण में कितनी उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी….. और, अपनी मृत्यु के 800 साल भी निभा रहा है…!
कमोबेश… लगभग हरेक सूफी और मजारों के चमत्कारों के किस्सों की तरह…. मोइद्दीन चिश्ती के चमत्कारों की भी काफी कथाएँ प्रचलित हैं…!
वैसे…. आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि….. ये मोइद्दीन चिश्ती साहब…. मोहम्मद साहब के वंशज समझे जाते हैं….. और, इन्होने सूफी की दीक्षा उस्मान हरवानी से ली थी…. जो की अपने समय के माने हुए सूफी संत कहलाते थे…!
सियर अल अकताब नामक पुस्तक के अनुसार….. मोइद्दीन चिश्ती के भारत आने के बाद से ही….. भारत में इस्लाम का पदार्पण हुआ….!
इस किताब के अनुसार… उन्होंने अपने तर्क और विद्वता से…. हिंदुस्तान में शिर्क (हिन्दू धर्म ) और कुफ्र ( मूर्ति पूजा ) के अँधेरे को नष्ट कर दिया….!
सत्तर वर्ष तक मोइद्दीन चिश्ती …. भारत की भूमि पर लगातार नमाज पढ़ते रहे….. और, उस दौरान जिस पर भी इनकी नजर पढ़ी….. वो… तुरत मुसलमान बन कर … तथाकथित अल्लाह का सामीप्य पा गया…!
हालाँकि…. कहा जाता है कि…. मोइद्दीन चिश्ती सोना बनाना जानते थे…. लेकिन… ये बात सत्य है कि…. इनके पाकशाला में इतना भोजन बनता था…. कि… नगर के सभी दरिद्र लोग वहां भोजन कर सकें…!
कहा जाता है कि…. जब नौकर उनसे धन मांगने जाता था तो…. वे अपने नमाज के दरी का कोन उठा देते थे….. जहाँ ढेर सारा सोना पड़ा रहता था….!
ये मोइद्दीन चिश्ती …. भारत कैसे पहुँच गए…. इसके बारे में एक बहुत ही मशहूर कहानी है कि….
एक बार जब … मोइद्दीन चिश्ती … मुहम्मद साहब के मजार की यात्रा करने गए तो….. वहां मजार से आवाज आई कि….. मोइद्दीन, तुम हमारे मजहब के सार हो और तुम्हे हिंदुस्तान जाना है…. क्योंकि… हिंदुस्तान के अजमेर में मेरा एक वंशज जिहाद करने गया था….. परन्तु वो….. काफिरों के हाथो मारा गया ….. और, अब वो भूमि काफिर हिन्दुओं के हाथ में चली गयी है…!
अतः… तुम्हारे हिंदुस्तान जाने से … इस्लाम एक बार फिर…. वहां अपनी प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा…. और, काफिर हिन्दू अल्लाह के कोप का भजन बनेंगे….!
इसपर… मोइद्दीन चिश्ती ने कहा….. “”हालाँकि वहां झील के पास बहुत से मूर्ति और मंदिर हैं…. लेकिन, अगर अल्लाह और पैगम्बर ने चाहा तो….मुझे उन मंदिरों और मूर्तियों को मिटने में ज्यादा समय नहीं लगेगा…!
इसके बाद …. ये मोइद्दीन चिश्ती साहब … हिंदुस्तान आकर …. यहाँ अपने इस्लाम का परचम लहराने लगे….!
अगर… मोइद्दीन चिश्ती के बारे में कहे जाने वाले…. चमत्कारिक कहानियों को वास्तविकता में कहें तो…. वो इस प्रकार की रही होगी कि…..
अजमेर में … मोइद्दीन चिश्ती से पहले भी कोई सूफी…. भारत में इस्लाम फैलाने के उद्देश्य से आया था…. जो कि…. यहाँ के हिन्दुओं के हाथो मारा गया…!
जब मोइद्दीन चिश्ती…. हज करने गए तो…. वहां के मुसलमानों ने चिश्ती को यह बात बताई….. और, उन्हें ढेर सारा धन देकर …. उन्हें जिहाद हेतु भारत जाने को प्रेरित किया….!
मोइद्दीन चिश्ती भारत आये…. और, अपने अथाह धन ( जो उन्हें जिहाद के लिए अरब के मुस्लिम शासकों द्वारा मिल रहा था) … और झूठे चमत्कारों के बल पर….. यहाँ के गरीब और अन्धविश्वासी लोगों में अपनी पैठ बना कर … उनका धर्मान्तरण शुरू कर दिया….!
फिर कुछ प्रभावशाली लोगों ने …जो किन्ही कारणों से …. दिल्ली के महाराज …. पृथ्वीराज चौहान से किसी कारण से रुष्ट थे….. चिश्ती से संपर्क किया ….और, उन सब ने मिल मोहम्मद गोरी को भारत पर आक्रमण के लिए प्रेरित किया…. और, उसे यहाँ हर संभव मदद का आश्वासन दिया….
अंततः…. गोरी ने भारत पर आक्रमण किया…. और, एक सच्चे हिन्दू राजा पृथ्वीराज चौहान की हत्या कर दी गयी…. और… उसके बाद भारत में इस्लाम के प्रसार का मार्ग प्रशस्त हो गया…!
सियर अल अकताब किताब के अनुसार…. इस घटना से पहले ही…. चिश्ती …. उस समय के मशहूर योगी…. अजयपाल को…. मुस्लिम बने में सफल हो गया था…. और, उसके मुसलमान बनाते ही….. चिश्ती ने अपना डेरा अजयपाल के विशाल मंदिर में ही जमा लिया…!
मोइद्दीन चिश्ती के मजार के बाहर…. विशाल बुलंद दरवाजों पर बने हिंदूवादी नक्काशी आज भी इस बात के गवाही देते हैं कि…. मोइद्दीन चिश्ती कि अगुआई में किस प्रकार भारत में धन और झूठे चमत्कारों के बल पर…. भारत का इस्लामीकरण का धंधा चलाया गया…!
आज भी एक ब्राह्मण परिवार चन्दन घिस कर…. मोइद्दीन चिश्ती के दरगाह में भेजता है…. जिसका लेप चिश्ती के मजार पर लगाया जाता है…!
परन्तु…. यह सभी जानते हैं कि…. इस्लाम में चन्दन घिसने की कोई प्रथा है ही नहीं…!
जाहिर है कि….. पुरातन काल से आज तक वो चन्दन … महंत अजयपाल के मंदिर के मूर्तियों के लिए भेजी जाती रही होंगी…. जिसे अब मजार पर लगा दिया जाता है…!
सियार अल अफीरिन… नामक पुस्तक…. चिश्ती के बारे में लिखते हैं कि….. चिश्ती के भारत आने से… भारत में इस्लाम का मार्ग प्रशस्त हो गया…. और, चिश्ती ने भारत में इस्लाम के प्रति अन्धविश्वास को ख़त्म कर…. भारत में इस्लाम को चारो और फैलाया….!
आमिर खुर्द की चौपाइयों के अनुसार…. चिश्ती के आने से पहले…. हिंदुस्तान .. इस्लाम और शरियत कानून से अनभिज्ञ था…. और… किसी को अल्लाह की महानता का ज्ञान नहीं था…. ना ही किसी ने काबा के दर्शन नहीं किये थे….!
लेकिन…. ख्वाजा के आने बाद….. उसकी तलवार और बुद्धि के कारण कुफ्रों की भूमि में … मंदिरों और मूर्तियों की जगह … मस्जिदों के मेहराब बन गए…!
जिस भूमि पर पहले…. सिर्फ मूर्तियों का गुणगान और मंदिरों की घंटियाँ सुनाई थी .. अब उस भूमि पर ….. नारिये तकबीर ( अल्लाहो -अकबर ) सुनाई देती है….!
मोइद्दीन चिश्ती के इस्लाम के प्रति इन्ही योगदानों के कारण उन्हें….. “” नबी ए हिन्द “” ( हिंदुस्तान का पैगम्बर ) भी कहा जाता है….. क्योंकि…. भारत में इस्लाम उन्ही के बदौलत फैला है….!
मोइद्दीन चिश्ती के…. इस्लाम पर किये गए इन्ही योगदानों के कारण…. हर पाकिस्तानी या बांग्लादेशी प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति उनका शुक्रिया अदा करने उनके मजार पर जाता है….. क्योंकि…. मोइद्दीन चिश्ती के बिना…. भारत में इस्लाम का फैलना बेहद ही मुश्किल था…!
अब आप खुद ही सोचें….. कि…. क्या हम हिन्दुओं से भी ज्यादा मूर्ख कोई हो सकता है….. जो अपने विनाशकर्ता को पूजे और…. उसपर अंध श्रद्धा दिखाए…?????
जागो हिन्दुओं…… अगर ऐसे ही आँख बंद करके भेडचाल में चलते रहे तो…… कल को तुम्हारा कोई नामलेवा नहीं बचेगा….!
जय महाकाल…!!!

Was there a Shiva Lingam in Mecca ?

( Was there a Shiva Lingam in Mecca ? )

I know I’m in for a lot of flak, but please take in this topic as an open-minded discussion and not as a religious war… There’s some truly fascinating stories going around on the origin of the Kaba.

Unquote:

When compared to Hinduism, Christianity & Islam are of recent origin. It is known that Mughals plundered many Indian Kingdoms & ended up destroying many temples & idols, terming the Hindus as ‘kafirs.’

According to archaeological surveys & historical evidences, Arabia was under the rule of Vikramaditya. Vikramaditya was a great devotee of Lord Shiva. He built a Shiva Lingam at Makkeshwara (which is now called Mecca).

The name Arab is derived from a Sanskrit word ‘Arav’ meaning horse. Hence, Arabia refers to the land of horses. Even before Islam originated, Sanatana Dharma existed in Arabia. Prophet Muhammad’s uncle, Umar-Bin-E-Hassham was a well-known poet whose famous Arabic poem in praise of lord Shiva is included in Sair-Ul-Okul and cited on a column in the fire worship pavilion in the rear garden of the Lakshmi Narayan temple in New Delhi.

A poem written by Labi-Bin-E-Akthab-Bin-E-Turfa, who lived in Arabia around 1850 B.C mentions all four Vedas. This verse can also be found in the Sair-Ul-Okul which is a published collection of ancient Arabic poetry. It was compiled in 1742 AD under the order of Turkish Sultan Salim.

THE POEM AND ITS INTERPRETATION ARE AS FOLLOWS-

We Tajakhayrobaudan Kalalwade-e liboawa

Walukayanayjatally, hay Yauma Tab asayru – 2

Wa Abalolhaa jabuarmeeman MAHADEVA

Manojailila muddin minhumwasayattaru – 3

Wa Sahabi Kay-yam feema-Kamil MINDAY Yauman

Wa Yakulum no latabahanfoeennakTawjjaru – 4

Massayarayakhalakanhasanan Kullahum

Najumumaja- at Summa gabul HINDU – 5

THE MEANING OF THE POEM IS –

The man who may spend his life in sin and irreligion or waste it in lechery and wrath – 1

If at least he relent and return to righteousness can he be saved? – 2

If but once he worship Mahadeva with a pure heart, he will attain the ultimate in spirituality – 3

Oh Lord (Shiva) exchange my entire life for but a day’s sojourn in India where one attains salvation – 4

But one pilgrimage there secures for one all merit and company of the truly great – 5

Source: Sair-ul-Okul, P. 235

The language of Arabia was Sanskrit & it later gave way to Arabic. Many Arabic words have been derived from Sanskrit. All the four Vedas find mention in Arabic literature. Thousands of words which have been derived from Sanskrit still exist in Arabic. Some poems mention about the Hindu rule in the area and also mention about famous kings like Vikramaditya.

To establish the supremacy of Islam as a religion, Prophet Muhammad broke down 360 idols of saints, gurus, kings & avatars.

This was done by Muhammad to establish the supremacy of Islam at the Kaaba. Archaeological findings prove this. The Kaaba was a Hindu shrine captured by the Muslims.

Pre-Islamic Arabs were followers of Lord Shiva & hence worshipped the moon. Even the word Allah is derived from the Arabic roots ‘Al’ meaning moon and ‘Illaha’ meaning god. This is the reason for Muslims worshipping the Moon god Allah or Chandrashekhara.

The word ‘Namaz’ is also derived from Sanskrit roots ‘Namah’ meaning to bow and ‘Yaja’ meaning worship. Recital of the Namaz five times a day owes its origin to the Vedic order of Panchamahayajna, which is part of the daily Vedic ritual prescribed for all Hindus. The original Vedic custom was to pray facing the east. In its aversion for everything Hindu, Islam directed its followers to pray facing the west.

Even today Muslims follow the old age customs of Brahmins. They wear white doti & chadar and shave their heads before havan. The same practice holds good in Mecca even today.

Take a look. So we can conclude that the whole West Asia & Arabia had strong links to Hinduism, which were later snubbed by the Arabic rulers.

सनातन धर्म में विवाह में सात फेरे ही क्यों लेते हैं- importance of “7” in Sanatan Hindu Dharm

सनातन धर्म में विवाह में सात फेरे ही क्यों लेते हैं?

आखिर हिन्दू विवाह के समय अग्नि के समक्ष सात फेरे ही क्यों लेते हैं? दूसरा यह कि क्या फेरे लेना जरूरी है?

पाणिग्रहण का अर्थ : – पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से ‘विवाह’ के नाम से जाना जाता है। वर द्वारा नियम और वचन स्वीकारोक्ति के बाद कन्या अपना हाथ वर के हाथ में सौंपे और वर अपना हाथ कन्या के हाथ में सौंप दे। इस प्रकार दोनों एक-दूसरे का पाणिग्रहण करते हैं। कालांतर में इस रस्म को ‘कन्यादान’ कहा जाने लगा, जो कि अनुचित है।

नीचे लिखे मंत्र के साथ कन्या अपना हाथ वर की ओर बढ़ाए, वर उसे अंगूठा सहित (समग्र रूप से) पकड़ ले। भावना करें कि दिव्य वातावरण में परस्पर मित्रता के भाव सहित एक-दूसरे के उत्तरदायित्व को स्वीकार कर रहे हैं।

ॐ यदैषि मनसा दूरं, दिशोऽ नुपवमानो वा।
हिरण्यपणोर् वै कर्ण, स त्वा मन्मनसां करोतु असौ।। -पार.गृ.सू. 1.4.15

विवाह का अर्थ : – विवाह को शादी या मैरिज कहना गलत है। विवाह का कोई समानार्थी शब्द नहीं है। विवाह= वि+वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है- विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना।

विवाह एक संस्कार : – अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का करार होता है जिसे कि विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है, लेकिन हिन्दू धर्म में विवाह बहुत ही भली-भांति सोच- समझकर किए जाने वाला संस्कार है। इस संस्कार में वर और वधू सहित सभी पक्षों की सहमति लिए जाने की प्रथा है। हिन्दू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संबंध से अधिक आत्मिक संबंध होता है और इस संबंध को अत्यंत पवित्र माना गया है।

सात फेरे या सप्तपदी : – हिन्दू धर्म में 16 संस्कारों को जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। विवाह में जब तक 7 फेरे नहीं हो जाते, तब तक विवाह संस्कार पूर्ण नहीं माना जाता। न एक फेरा कम, न एक ज्यादा। इसी प्रक्रिया में दोनों 7 फेरे लेते हैं जिसे ‘सप्तपदी’ भी कहा जाता है। ये सातों फेरे या पद 7 वचन के साथ लिए जाते हैं। हर फेरे का एक वचन होता है जिसे पति-पत्नी जीवनभर साथ निभाने का वादा करते हैं। ये 7 फेरे ही हिन्दू विवाह की स्थिरता का मुख्य स्तंभ होते हैं। अग्नि के 7 फेरे लेकर और ध्रुव तारे को साक्षी मानकर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं।

सात अंक का महत्व…

ध्यान देने योग्य बात है कि भारतीय संस्कृति में 7 की संख्या मानव जीवन के लिए बहुत विशिष्ट मानी गई है। संगीत के 7 सुर, इंद्रधनुष के 7 रंग, 7 ग्रह, 7 तल, 7 समुद्र, 7 ऋषि, सप्त लोक, 7 चक्र, सूर्य के 7 घोड़े, सप्त रश्मि, सप्त धातु, सप्त पुरी, 7 तारे, सप्त द्वीप, 7 दिन, मंदिर या मूर्ति की 7 परिक्रमा, आदि का उल्लेख किया जाता रहा है।

उसी तरह जीवन की 7 क्रियाएं अर्थात- शौच, दंत धावन, स्नान, ध्यान, भोजन, वार्ता और शयन। 7 तरह के अभिवादन अर्थात- माता, पिता, गुरु, ईश्वर, सूर्य, अग्नि और अतिथि। सुबह सवेरे 7 पदार्थों के दर्शन- गोरोचन, चंदन, स्वर्ण, शंख, मृदंग, दर्पण और मणि। 7 आंतरिक अशुद्धियां- ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, घृणा और कुविचार। उक्त अशुद्धियों को हटाने से मिलते हैं ये 7 विशिष्ट लाभ- जीवन में सुख, शांति, भय का नाश, विष से रक्षा, ज्ञान, बल और विवेक की वृद्धि।

स्नान के 7 प्रकार- मंत्र स्नान, मौन स्नान, अग्नि स्नान, वायव्य स्नान, दिव्य स्नान, मसग स्नान और मानसिक स्नान। शरीर में 7 धातुएं हैं- रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मजा और शुक्र। 7 गुण- विश्वास, आशा, दान, निग्रह, धैर्य, न्याय, त्याग। 7 पाप- अभिमान, लोभ, क्रोध, वासना, ईर्ष्या, आलस्य, अति भोजन और 7 उपहार- आत्मा के विवेक, प्रज्ञा, भक्ति, ज्ञान, शक्ति, ईश्वर का भय।

यही सभी ध्यान रखते हुए अग्नि के 7 फेरे लेने का प्रचलन भी है जिसे ‘सप्तपदी’ कहा गया है। वैदिक और पौराणिक मान्यता में भी 7 अंक को पूर्ण माना गया है। कहते हैं कि पहले 4 फेरों का प्रचलन था। मान्यता अनुसार ये जीवन के 4 पड़ाव- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक था।

हमारे शरीर में ऊर्जा के 7 केंद्र हैं जिन्हें ‘चक्र’ कहा जाता है। ये 7 चक्र हैं- मूलाधार (शरीर के प्रारंभिक बिंदु पर), स्वाधिष्ठान (गुदास्थान से कुछ ऊपर), मणिपुर (नाभि केंद्र), अनाहत (हृदय), विशुद्ध (कंठ), आज्ञा (ललाट, दोनों नेत्रों के मध्य में) और सहस्रार (शीर्ष भाग में जहां शिखा केंद्र) है।

उक्त 7 चक्रों से जुड़े हैं हमारे 7 शरीर। ये 7 शरीर हैं- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर, मानस शरीर, आत्मिक शरीर, दिव्य शरीर और ब्रह्म शरीर।

विवाह की सप्तपदी में उन शक्ति केंद्रों और अस्तित्व की परतों या शरीर के गहनतम रूपों तक तादात्म्य बिठाने करने का विधान रचा जाता है। विवाह करने वाले दोनों ही वर और वधू को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से एक-दूसरे के प्रति समर्पण और विश्वास का भाव निर्मित किया जाता है।

मनोवैज्ञानिक तौर से दोनों को ईश्वर की शपथ के साथ जीवनपर्यंत तक दोनों से साथ निभाने का वचन लिया जाता है इसलिए विवाह की सप्तपदी में 7 वचनों का भी महत्व है।

सप्तपदी में पहला पग भोजन व्यवस्था के लिए, दूसरा शक्ति संचय, आहार तथा संयम के लिए, तीसरा धन की प्रबंध व्यवस्था हेतु, चौथा आत्मिक सुख के लिए, पांचवां पशुधन संपदा हेतु, छठा सभी ऋतुओं में उचित रहन-सहन के लिए तथा अंतिम 7वें पग में कन्या अपने पति का अनुगमन करते हुए सदैव साथ चलने का वचन लेती है तथा सहर्ष जीवनपर्यंत पति के प्रत्येक कार्य में सहयोग देने की प्रतिज्ञा करती है।

‘मैत्री सप्तपदीन मुच्यते’ अर्थात एकसाथ सिर्फ 7 कदम चलने मात्र से ही दो अनजान व्यक्तियों में भी मैत्री भाव उत्पन्न हो जाता है अतः जीवनभर का संग निभाने के लिए प्रारंभिक 7 पदों की गरिमा एवं प्रधानता को स्वीकार किया गया है। 7वें पग में वर, कन्या से कहता है कि ‘हम दोनों 7 पद चलने के पश्चात परस्पर सखा बन गए हैं।’

मन, वचन और कर्म के प्रत्येक तल पर पति-पत्नी के रूप में हमारा हर कदम एकसाथ उठे इसलिए आज अग्निदेव के समक्ष हम साथ-साथ 7 कदम रखते हैं। हम अपने गृहस्थ धर्म का जीवनपर्यंत पालन करते हुए एक-दूसरे के प्रति सदैव एकनिष्ठ रहें और पति-पत्नी के रूप में जीवनपर्यंत हमारा यह बंधन अटूट बना रहे तथा हमारा प्यार 7 समुद्रों की भांति विशाल और गहरा हो।

By mamta Yas