Aryabhat and value of Pi

HINDUISM AND SANATAN DHARMA

ARYABHATA and the Value of Pi [∏]

This is about the value of pi [∏], discovered by Âryabhata [3000 BCE]. Alberuni mentions that there could have been two Âryabhatas. If that is true [which is doubted] the earlier Âryabhata who lived in Kusumapura, which was like Silicon Valley for Technology today, was the ancient Âryabhata. His great work, Âryabhatîyam, became the great sourcebook of astronomical, mathematical and scientific knowledge. Since ancient times, several commentators have translated, explained with diagrams, and commented on Âryabhatîyam. However, recently, it was translated and mathematically explained by Walter Eugene Clark. This text was first published in Leiden by Kern. Soon, L. Rodet translated it into French in 1879, G. R. Kaye translated with notes in 1899. Sarada Kanta Ganguly explained the sutras of Âryabhatîyam mathematically with greater accuracy than Avadhesh Narayan Singh. Kripa Shankar Shukla also translated the text with commentary.

One of the greatest…

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तुलसीदास जी ने भी बाबरी मस्जिद का उल्लेख किया है

तुलसीदास जी ने भी बाबरी मस्जिद का उल्लेख किया है !!!

सच ये है कि कई लोग तुलसीदास जी की सभी रचनाओं से अनभिज्ञ हैं और अज्ञानतावश ऐसी बातें करते हैं l

वस्तुतः रामचरित मानस के अलावा तुलसीदास जी ने कई अन्य ग्रंथो की भी रचना की है।

तुलसीदास जी ने “तुलसी शतक” में इस घंटना का विस्तार से विवरण भी दिया है।

हमारे वामपंथी विचारकों तथा इतिहासकारों ने ये भ्रम की स्थिति उत्पन्न की, कि रामचरितमानस में ऐसी कोई घटना का वर्णन नहीं है।

श्री नित्यानंद मिश्रा ने जिज्ञासु के एक पत्र व्यवहार में “तुलसी दोहा शतक” का अर्थ इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रस्तुत किया है। हमने भी उन अर्थों को आप तक पहुंचने का प्रयास किया है।

प्रत्येक दोहे का अर्थ उनके नीचे दिया गया है, ध्यान से पढ़ें:-

(1)

मन्त्र उपनिषद ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास।

जवन जराये रोष भरि करि तुलसी परिहास॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि क्रोध से ओतप्रोत यवनों ने बहुत सारे मन्त्र (संहिता), उपनिषद, ब्राह्मणग्रन्थों (जो वेद के अंग होते हैं) तथा पुराण और इतिहास सम्बन्धी ग्रन्थों का उपहास करते हुये उन्हें जला दिया।

(2)

सिखा सूत्र से हीन करि बल ते हिन्दू लोग।

भमरि भगाये देश ते तुलसी कठिन कुजोग॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि ताकत से हिंदुओं की शिखा (चोटी) और यग्योपवीत से रहित करके उनको गृहविहीन कर अपने पैतृक देश से भगा दिया।

(3)

बाबर बर्बर आइके कर लीन्हे करवाल।

हने पचारि पचारि जन तुलसी काल कराल॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि हाँथ में तलवार लिये हुये बर्बर बाबर आया और लोगों को ललकार ललकार कर हत्या की। यह समय अत्यन्त भीषण था।

(4)

सम्बत सर वसु बान नभ ग्रीष्म ऋतु अनुमानि।

तुलसी अवधहिं जड़ जवन अनरथ किये अनखानि॥

(इस दोहा में ज्योतिषीय काल गणना में अंक दायें से बाईं ओर लिखे जाते थे, सर (शर) = 5, वसु = 8, बान (बाण) = 5, नभ = 1 अर्थात विक्रम सम्वत 1585 और विक्रम सम्वत में से 57 वर्ष घटा देने से ईस्वी सन 1528 आता है।

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि सम्वत् 1585 विक्रमी (सन 1528 ई) अनुमानतः ग्रीष्मकाल में जड़ यवनों अवध में वर्णनातीत अनर्थ किये। (वर्णन न करने योग्य)।

(5)

राम जनम महि मंदरहिं, तोरि मसीत बनाय।

जवहिं बहुत हिन्दू हते, तुलसी कीन्ही हाय॥

जन्मभूमि का मन्दिर नष्ट करके, उन्होंने एक मस्जिद बनाई। साथ ही तेज गति उन्होंने बहुत से हिंदुओं की हत्या की। इसे सोचकर तुलसीदास शोकाकुल हुये।

(6)

दल्यो मीरबाकी अवध मन्दिर रामसमाज।

तुलसी रोवत ह्रदय हति त्राहि त्राहि रघुराज॥

मीर बाकी ने मन्दिर तथा रामसमाज (राम दरबार की मूर्तियों) को नष्ट किया। राम से रक्षा की याचना करते हुए विदीर्ण ह्रदय तुलसी रोये।

(7)

राम जनम मन्दिर जहाँ तसत अवध के बीच।

तुलसी रची मसीत तहँ मीरबाकी खाल नीच॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि अयोध्या के मध्य जहाँ राममन्दिर था वहाँ नीच मीर बाकी ने मस्जिद बनाई।

(8)

रामायन घरि घट जँह, श्रुति पुरान उपखान।

तुलसी जवन अजान तँह, कइयों कुरान अज़ान॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि जहाँ रामायण, श्रुति, वेद, पुराण से सम्बंधित प्रवचन होते थे, घण्टे, घड़ियाल बजते थे, वहाँ अज्ञानी यवनों की कुरआन और अज़ान होने लगे।

अब यह स्पष्ट हो गया कि गोस्वामी तुलसीदास जी की इस रचना में जन्मभूमि विध्वंस का विस्तृत रूप से वर्णन किया किया है !

सभी से विनम्र निवेदन है कि सभी देशवासियों को अपने सभ्यता के स्वर्णिम युग के गौरवशाली अतीत के बारे में बताइये।

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Vishnu in Russia

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Ancient Vishnu idol found in Russian town

An ancient statue of Lord Vishnu has been found during excavation in an old village in Russia ‘s Volga region, raising questions about the prevalent view on the origin of ancient Russia.

The statue found in Staraya (old) Maina village dates back to VII-X century AD. Staraya Maina village in Ulyanovsk region was a highly populated city 1700 years ago, much older than Kiev, so far believed to be the mother of all Russian cities.

“We may consider it incredible, but we have ground to assert that Middle-Volga region was the original land of Ancient Rus. This is a hypothesis, but a hypothesis, which requires thorough research,” Reader of Ulyanovsk State University’s archaeology department Alexander Kozhevin told state-run television Vesti.

Kozhevin, who has been conducting excavation in Staraya Maina for last seven years, said that every single square metre of the surroundings of…

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|| लोभ का कुआ ||

|| लोभ का कुआ ||
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एक बार राजा भोज के दरबार में एक सवाल उठा कि ‘ ऐसा कौन सा कुआं है जिसमें गिरने के बाद आदमी बाहर नहीं निकल पाता?’ इस प्रश्न का उत्तर कोई नहीं दे पाया।

आखिर में राजा भोज ने राज पंडित से कहा कि इस प्रश्न का उत्तर सात दिनों के अंदर लेकर आओ, वरना आपको अभी तक जो इनाम धन आदि दिया गया है,वापस ले लिए जायेंगे तथा इस नगरी को छोड़कर दूसरी जगह जाना होगा।

छः दिन बीत चुके थे।राज पंडित को जबाव नहीं मिला था।निराश होकर वह जंगल की तरफ गया। वहां उसकी भेंट एक गड़रिए से हुई। गड़रिए ने पूछा -” आप तो राजपंडित हैं, राजा के दुलारे हो फिर चेहरे पर इतनी उदासी क्यों?

यह गड़रिया मेरा क्या मार्गदर्शन करेगा?सोचकर पंडित ने कुछ नहीं कहा।इसपर गडरिए ने पुनः उदासी का कारण पूछते हुए कहा -” पंडित जी हम भी सत्संगी हैं,हो सकता है आपके प्रश्न का जवाब मेरे पास हो, अतः नि:संकोच कहिए।” राज पंडित ने प्रश्न बता दिया और कहा कि अगर कलतक प्रश्न का जवाब नहीं मिला तो राजा नगर से निकाल देगा।

गड़रिया बोला -” मेरे पास पारस है उससे खूब सोना बनाओ। एक भोज क्या लाखों भोज तेरे पीछे घूमेंगे।बस,पारस देने से पहले मेरी एक शर्त माननी होगी कि तुझे मेरा चेला बनना पड़ेगा।”

राज पंडित के अंदर पहले तो अहंकार जागा कि दो कौड़ी के गड़रिए का चेला बनूं? लेकिन स्वार्थ पूर्ति हेतु चेला बनने के लिए तैयार हो गया।

गड़रिया बोला -” *पहले भेड़ का दूध पीओ फिर चेले बनो। राजपंडित ने कहा कि यदि ब्राह्मण भेड़ का दूध पीयेगा तो उसकी बुद्धि मारी जायेगी। मैं दूध नहीं पीऊंगा। तो जाओ, मैं पारस नहीं दूंगा – गड़रिया बोला।

राज पंडित बोला -” ठीक है,दूध पीने को तैयार हूं,आगे क्या करना है?”

गड़रिया बोला-” अब तो पहले मैं दूध को झूठा करूंगा फिर तुम्हें पीना पड़ेगा।

राजपंडित ने कहा -” तू तो हद करता है! ब्राह्मण को झूठा पिलायेगा?” तो जाओ, गड़रिया बोला।

राज पंडित बोला -” मैं तैयार हूं झूठा दूध पीने को ।”

गड़रिया बोला-” वह बात गयी।अब तो सामने जो मरे हुए इंसान की खोपड़ी का कंकाल पड़ा है, उसमें मैं दूध दोहूंगा,उसको झूठा करूंगा, कुत्ते को चटवाऊंगा फिर तुम्हें पिलाऊंगा।तब मिलेगा पारस। नहीं तो अपना रास्ता लीजिए।”

राजपंडित ने खूब विचार कर कहा-” है तो बड़ा कठिन लेकिन मैं तैयार हूं।

गड़रिया बोला-” मिल गया जवाब। यही तो कुआं है!लोभ का, तृष्णा का जिसमें आदमी गिरता जाता है और फिर कभी नहीं निकलता। जैसे कि तुम पारस को पाने के लिए इस लोभ रूपी कुएं में गिरते चले गए।

|| ॐ नमः शिवायः ||

क्या हैं अष्ट सिद्धियाँ और नव निधियां

क्या हैं अष्ट सिद्धियाँ और नव निधियां

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१. अणिमा : अष्ट सिद्धियों में सबसे पहली सिद्धि अणिमा हैं, जिसका अर्थ! अपने देह को एक अणु के समान सूक्ष्म करने की शक्ति से हैं। जिस प्रकार हम अपने नग्न आंखों एक अणु को नहीं देख सकते, उसी तरह अणिमा सिद्धि प्राप्त करने के पश्चात दुसरा कोई व्यक्ति सिद्धि प्राप्त करने वाले को नहीं देख सकता हैं। साधक जब चाहे एक अणु के बराबर का सूक्ष्म देह धारण करने में सक्षम होता हैं।

२. महिमा : अणिमा के ठीक विपरीत प्रकार की सिद्धि हैं महिमा, साधक जब चाहे अपने शरीर को असीमित विशालता करने में सक्षम होता हैं, वह अपने शरीर को किसी भी सीमा तक फैला सकता हैं।

३. गरिमा : इस सिद्धि को प्राप्त करने के पश्चात साधक अपने शरीर के भार को असीमित तरीके से बढ़ा सकता हैं। साधक का आकार तो सीमित ही रहता हैं, परन्तु उसके शरीर का भार इतना बढ़ जाता हैं कि उसे कोई शक्ति हिला नहीं सकती हैं।

४. लघिमा : साधक का शरीर इतना हल्का हो सकता है कि वह पवन से भी तेज गति से उड़ सकता हैं। उसके शरीर का भार ना के बराबर हो जाता हैं।

५. प्राप्ति : साधक बिना किसी रोक-टोक के किसी भी स्थान पर, कहीं भी जा सकता हैं। अपनी इच्छानुसार अन्य मनुष्यों के सन्मुख अदृश्य होकर, साधक जहाँ जाना चाहें वही जा सकता हैं तथा उसे कोई देख नहीं सकता हैं।

६. पराक्रम्य : साधक किसी के मन की बात को बहुत सरलता से समझ सकता हैं, फिर सामने वाला व्यक्ति अपने मन की बात की अभिव्यक्ति करें या नहीं।

७. इसित्व : यह भगवान की उपाधि हैं, यह सिद्धि प्राप्त करने से पश्चात साधक स्वयं ईश्वर स्वरूप हो जाता हैं, वह दुनिया पर अपना आधिपत्य स्थापित कर सकता हैं।

८. वसित्व : वसित्व प्राप्त करने के पश्चात साधक किसी भी व्यक्ति को अपना दास बनाकर रख सकता हैं। वह जिसे चाहें अपने वश में कर सकता हैं या किसी की भी पराजय का कारण बन सकता हैं।

नव निधियां- पद्म निधि, महापद्म निधि, नील निधि, मुकुंद निधि, नन्द निधि, मकर निधि, कच्छप निधि, शंख निधि, खर्व निधि।

विनाश काले विपरीत पूजा-बहराइच का सबसे मुख्य गाजी बाबा

विनाश काले विपरीत पूजा

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सैकड़ों निर्दोष लोगों के हत्यारे कसाब को फांसी हो चुकी है ! मान लो एक खास संप्रदाय के लोग उसे शहीद का दर्जा दे देते है ! और उसकी मजार बना देते है फिर वहाँ रोज माथा टेकना शुरू कर देते है 10-15 साल बाद भीड़ को देखते हुए हिन्दू भी वहाँ माथा टेकने लग जाते है !!

पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक शहर है,बहराइच । बहराइच में हिन्दू समाज का सबसे मुख्य पूजा स्थल है गाजी बाबा की मजार। मूर्ख हिंदू लाखों रूपये हर वर्ष इस पीर पर चढाते है।इतिहास जानकार हर व्यक्ति जानता है,कि महमूद गजनवी के उत्तरी भारत को १७ बार लूटने व बर्बाद करने के कुछ समय बाद उसका भांजा सलार गाजी भारत को दारूल इस्लाम बनाने के उद्देश्य से भारत पर चढ़ आया ।
(कुरान के अनुसार दर-उल -इस्लाम = 100% मुस्लिम जनसँख्या )
वह पंजाब ,सिंध, आज के उत्तर प्रदेश को रोंद्ता हुआ बहराइच तक जा पंहुचा। रास्ते में उसने लाखों हिन्दुओं का कत्लेआम कराया,लाखों हिंदू औरतों के बलात्कार हुए, हजारों मन्दिर तोड़ डाले।
राह में उसे एक भी ऐसा हिन्दू वीर नही मिला जो उसका मान मर्दन कर सके। इस्लाम की जेहाद की आंधी को रोक सके। परंतु बहराइच के राजा सुहेल देव राजभार ने उसको थामने का बीडा उठाया । वे अपनी सेना के साथ सलार गाजी के हत्याकांड को रोकने के लिए जा पहुंचे । महाराजा व हिन्दू वीरों ने सलार गाजी व उसकी दानवी सेना को मूली गाजर की तरह काट डाला । सलार गाजी मारा गया। उसकी भागती सेना के एक एक हत्यारे को काट डाला गया।
हिंदू ह्रदय राजा सुहेल देव राजभार ने अपने धर्म का पालन करते हुए, सलार गाजी को इस्लाम के अनुसार कब्र में दफ़न करा दिया। कुछ समय पश्चात् तुगलक वंश के आने पर फीरोज तुगलक ने सलारगाजी को इस्लाम का सच्चा संत सिपाही घोषित करते हुए उसकी मजार बनवा दी।
आज उसी हिन्दुओं के हत्यारे, हिंदू औरतों के बलातकारी ,मूर्ती भंजन दानव को हिंदू समाज एक देवता की तरह पूजता है। सलार गाजी हिन्दुओं का गाजी बाबा हो गया है। हिंदू वीर शिरोमणि सुहेल देव भुला दिए गएँ है और सलार गाजी हिन्दुओं का भगवन बनकर हिन्दू समाज का पूजनीय हो गया है।
अब गाजी की मजार पूजने वाले ,ऐसे हिन्दुओं को मूर्ख न कहे तो क्या कहें ?
ऐसे ही अजमेर में मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है, जिसकी मदद से ही मोहम्मद गोरी आया था और पहले शरण देने के लिए पृथ्वी राज चौहान की पत्नी और बेटियों को धोखे से बुलवाया और फिर उसे मोहम्मद गोरी के सैनिकों के हवाले कर उनका बलात्कार होने दिया। बाद में उस चिश्ती को पृथ्वी राज चौहान की उन‌ बेटियों ने ही उसकी हत्या कर अपने माता-पिता की हत्या का बदला लिया। हालांकि बाद में उन्हें भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और कुकर्मी उनकी लाशों से भी अपनी हवस मिटाते रहे।
अतः हर हिन्दू से निवेदन है कि इतिहास से सबक लें और किसी भी दरगाह या मजार पर ना जायें।हमारे हर देवी-देवताओं के हाथों में शस्त्र की परिकल्पना की गई है उसका निहतार्थ समझें। ईश्वर आपके भीतर ही है और आपकी रक्षा करने वाला कोई और नहीं बल्कि आप खुद हैं। अतः कायरता का त्याग करें। शूर-वीर ही धरती पर अपना अस्तित्व बनाए रख सकते हैं। जब जीवन में शेष कुछ ना बचे तो भी बहुत कुछ बचता है, हम अपना जीवन राष्ट्र और धर्म को समर्पित कर सकते हैं। अपने बच्चे भले ही आपकी बात ना माने लेकिन हो सकता है कि किसी को आपके विचार अच्छे लगें। *वीर भोग्या वसुंधरा*।